70 वर्ष की उम्र में जगी शिक्षा की नई रोशनी — लालती देवी की प्रेरक कहानी

लालती देवी (70 वर्ष), ग्राम बरही नेवादा, बड़ागांव, वाराणसी
जीवनभर के संघर्ष के बाद आज प्रौढ़ शिक्षा के माध्यम से अपने अधूरे सपनों को साकार करती हुईं। शिक्षा ने उन्हें नया आत्मविश्वास, सम्मान और पहचान दी है
प्रौढ़ शिक्षा कक्षा का दृश्य – बड़ागांव, वाराणसी
शिव नाडर फाउंडेशन की शिक्षा प्लस (Shiksha Plus) पहल के अंतर्गत जन मित्र न्यास द्वारा संचालित प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में महिलाएँ उत्साहपूर्वक पढ़ाई करती हुईं। यह पहल ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की नई राह खोल रही है।

यह कहानी शिव नाडर फाउंडेशन की शिक्षा प्लस (Shiksha Plus) पहल के अंतर्गत चल रहे प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम की एक शिक्षार्थी की आत्म-संघर्ष और जीवनभर की वंचना से उभरती हुई सशक्त गवाही है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के बड़ागांव ब्लॉक में जन मित्र न्यास द्वारा क्रियान्वित यह कार्यक्रम उन लोगों के जीवन में शिक्षा की रोशनी ला रहा है, जिन्होंने वर्षों तक अभाव, कठिनाई और अवसरों की कमी को सहा, पर सीखने की आशा कभी नहीं छोड़ी।
 
“सीखने की कोई उम्र नहीं होती” — इस सत्य को ग्राम बरही नेवादा की 70 वर्षीय लालती देवी ने अपने जीवन से साबित कर दिया है।

लालती देवी, पत्नी श्री ललईराम गोंड, कहार समुदाय से आती हैं। उनका पूरा जीवन संघर्ष, कठिन परिश्रम और त्याग की कहानी रहा है। बचपन से ही परिस्थितियों ने उन्हें जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया था। बड़े घरों में मजदूरी करते हुए उनका बचपन बीत गया, लेकिन उनके मन में एक छोटी-सी चाह हमेशा जीवित रही — पढ़ने और लिखने की चाह।

जब वह अपने आसपास की लड़कियों को साफ-सुथरे कपड़ों में, हाथों में किताबें लिए स्कूल जाते देखती थीं, तो उनका मन भी तड़प उठता था। वे अक्सर सोचतीं — “काश मैं भी पढ़ पाती, काश मैं भी स्कूल जा पाती।” परंतु गरीबी, दूरी और सामाजिक परिस्थितियों ने उनके इस सपने को जन्म लेते ही रोक दिया।

समय बीतता गया। लालती देवी कभी स्कूल नहीं जा सकीं, न ही शिक्षा का अनुभव कर पाईं। मात्र 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया और वे गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों में पूरी तरह समर्पित हो गईं। परिवार, मेहनत और संघर्ष के बीच उन्होंने यह मान लिया कि शिक्षा शायद उनके भाग्य में नहीं है।

देखते ही देखते 70 वर्ष गुजर गए।

लेकिन जीवन हमेशा उम्मीद का एक दरवाज़ा खुला रखता है।

एक दिन उनके गाँव बरही नेवादा में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत हुई। गाँव की ही बहू सपना सिंह को जन शिक्षक के रूप में जिम्मेदारी मिली। जब सपना सिंह ने लालती देवी को इस कार्यक्रम के बारे में बताया, तो उनकी वर्षों पुरानी दबी इच्छा अचानक जाग उठी। उनकी आँखें नम हो गईं और उन्होंने भावुक होकर पूछा —
“क्या मैं अब पढ़ सकती हूँ? क्या इस उम्र में सीखना संभव है?”

यह प्रश्न नहीं, बल्कि एक अधूरे सपने की पुकार थी।

आज लालती देवी नियमित रूप से कक्षा में आती हैं, पूरे मन से पढ़ाई करती हैं और अक्षरों से अपनी नई पहचान बना रही हैं। अब वे अपना नाम लिख लेती हैं, शब्द पहचानती हैं और आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराती हैं। शिक्षा ने उनके जीवन में केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मविश्वास और एक नई खुशी भर दी है।

जो सपना दशकों तक उनके मन में दबा रहा, आज वह साकार हो रहा है।

लालती देवी कहती हैं —
“इस प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम ने मेरी अधूरी इच्छा पूरी कर दी। अब मुझे लगता है कि मैं भी कुछ कर सकती हूँ। सच है, पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती।”

उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि अवसर मिलने पर हर जीवन बदल सकता है। शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान नहीं देती — यह आत्मसम्मान जगाती है, व्यक्तित्व को सशक्त बनाती है और जीवन में नई दिशा देती है।

लालती देवी आज केवल एक शिक्षार्थी नहीं हैं, बल्कि उन हजारों लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जिन्होंने कभी यह मान लिया था कि अब बहुत देर हो चुकी है।

क्योंकि सच तो यही है —
सपनों की कोई उम्र नहीं होती, और शिक्षा का सूरज कभी भी उग सकता है।

वीडियो गवाही (Testimony)
70 वर्ष की उम्र में शिक्षा की ओर बढ़ते कदम — यह केवल सीखने की कहानी नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, साहस और नए जीवन की शुरुआत की कहानी है।

📍 स्थान: बड़ागांव, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
📚 क्रियान्वयन: जन मित्र न्यास
🤝 सहयोग: शिव नाडर फाउंडेशन – शिक्षा प्लस पहल

संदेश:
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। अवसर मिले तो हर जीवन बदल सकता है।

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